Category Archives: कविता



meera in doli                           Mirabai Photo

देखो रे कमला! देखो रे विंमला!

ये कौन बैठी हे डोली मे, अपने पिया के इंतज़ार मे! बेज़बर! बेकरार!

अपने पिया मिलन के सपने सजाए आँखों मे

अरे! ये तो है मीरा बाँवरी, जो किशन का नाम लिए बैठी है!

ना ये मानी अपनों की बात! और ना मानी दूसरों की बात

मानी तो मानी सिर्फ़ अपने मन की बात, जो किशन के प्रेम मे पागल है

राज! दौलत! मान! यश! क्या नही है इसके लिए?

अगर ये राजमहल की मर्यादा के पार ना जाए तो!

इतनी दौलत! इतना मान! इतना सुख!

ये तो हम सपने मे भी अनुभव नही कर सकते!

और ये है देखो सब कुछ ठुकराकर बैठी है किशन किशन जाब्ते

और घूमती है बाँवरी उनके गुण गाती!

क्या ये नही जानती कि किशन तो है नटखट! निर्मोही!

और कभी किसी की मोह मे ना आता, चाहे वो राधा या चाहे वो मीरा!

और हो ही…

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सनम बेवफा



हे मेरे चितचोर! यह कैसी लीला तुम्हारी?

प्रेम तो यक़ीनन आपको है हम से ! फिर ये सितम कैसी, यह बेदर्दी कैसी?

कि ना तो हम इस जग मे है और ना ही निरंतर विश्राम पाए है शिव कुटीर मे!

चलो! जो भी होता है तुम्हारी इच्छा अनुसार ही तो होता है!

इसमे हमे सुखून मिलता है कि हम तुम्हारे है!

और जो इच्छा तुम्हारा तुम वोही करते हो!

चाहे इससे हम मचलते है, तड़पते है या जल जाते है, तुम्हे इससे क्या?

कितनी ख़ुशक़िस्मत हूँ मे कि तुमने मुझे अपना लिया!

और करते जाओ हमसे बेवफ़ाई!

क्योंकी जिससे प्यार है उसी से होते शिकवे बेवफ़ाई के!

शिकवे, प्रेम सिर्फ़ तुमसे है और किसी से क्यों फला?

हे किशन! और किसी से फला क्यों?

मेरा और कोन है इस दुनिया मे और सृष्टि मे तेरे सिवा?

अछा! ये बताओ तेरे सिवा और कुछ भी है क्या इस संसार मे?

मुझे यकीन नही होगा तुम…

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sri sri yogaYoga…yoga…yoga

It ‘s in the headlines nowadays
So also is it on FM, Television , Facebook and Twitter!
And of course going global  in a big way!
Who are those who practice and preach Yoga?

Many are seekers of good health
Some wisdom, and, some of peace
And ,some  others, may  be, of the satisfaction of being ‘trendy’!
No matter what he or she seeks

It is a new beginning and a fresh lease of life
For surely does it bring good health
And a disease-free body
Or, to say the least, reduces the suffering due to ailments
For many an ailment is due to stress and a harmful life-style

Surely does it lead to a stress-free mind
A pure intellect not dulled by fear, superstition doubt and negativity
Yoga , with regular practice, doesn’t bring any blessings from heaven
Neither does it increase the awareness, the power of the mind
Nor does it increase the IQ!

For all these are already there within!
Yoga just cleans the chakras
And rejuvenates each cell in the body
Unclogs the blocks that mar pure thoughts , reason and intellect

It stabilizes the mind and the emotions!
To manifest as power …of undivided focus, increased awareness
To tackle oneself, others in ‘to do or not to do’ situations!
Each of us is gifted equally by God

For He is as impartial as can be
But in the journey of lifetimes we have collected ‘muck’
And carried it along to this moment
It’s a psycho-somatic phenomenon!

All those moments that we have not lived in the present
Have remained as impressions within us
As health hazards…be it of the body, be it of the mind and the emotions
All these come to naught with regular practice of yoga!

Believe in it and do it and it happens!
For, what you believe in, happens to you!
Practice of yoga does not harm any religion, race or creed
But brings peace, bliss , contentment and positivity in life!

And the deepest impressions that are the subtlest possible
Can be erased with the practice of Sudarshan Kriya
It’s a wonder….the greatest of gifts given to man in this kaliyuga
Riot—worne as man is ‘within’ and ‘without’!

Man wants to swallow a few pills
And take the easy way out
To rid himself of disease of body and mind
He seems to get some relief by drinking, smoking and drugs!

All that he seeks from outside to rid himself of stress
Be it fine arts, sports , and other things that he loves to pursue
Are of course very good and do good
But then they can’t bring long-lasting results

For, the blocks within don’t let them do so
And these can be removed by nothing else by regular practice of yoga
So let’s all make a new beginning and rejuvenate ourselves
Let’s make a start to honor this International Day of Yoga!

Come one! Come all! Join the yoga bandwagon!
No better life,,, no greater luck…no change of people and circumstances
But, for sure, a change will happen in you, in course of time!
The same people, the same situations, the same world
The same challenges in life, but you alone won’t be the same!
You will change for the better!

Better health, less, lesser and least stress
Greater memory, A joyful disposition
A peaceful mind , increased awareness and a positive outlook!
The latter are our only hope of remaining happy and peaceful

For if we are peaceful and happy, we spread the same around us
For without all of us being happy
We can’t make it a better world for our posterity
So … Yoga , Yoga, and Yoga!

Let’s all commit ourselves to regular practice of yoga
On a daily basis at least for the next three months
Let’s  do it 100%, putting our heart and soul into it
With unshakable faith and grateful hearts!

It’s time to come together this way
The only way to uplift the collective consciousness
And slowly but surely bring about a change
Yes ! A change within ourselves, in the family, in society, in the nation, in the world and in All Creation!

May the Lord bless each of us
With the awareness and willingness to receive this gift !
Come One! Come All
Gift yourself with this golden opportunity!

To ‘meet yourself’, ‘understand yourself’ ‘love yourself’ and love all!
And bring out the real YOU from within
And live life to your optimum
And then do you spread the fragrance Nature’s Way!




आयो रे सावन! आयो रे सावन!
हुमारे किशन के आने का पैगाम लिए
देखो रे कांता! देखो रे ज्वाला!
रिम-झिम, रिम-झिम सावन के मधुर गीत!

आयो रे मेघा अंबार के विशाल क्षेत्रा मे
घने है बादल, काली ओडनी लहराए!
जैसे चुराए हो उनकी आँखों से काजल!
ये तो उनके आने का पैगाम है और क्या?

पंछी बोले कू.कू-कू, मेन्डक बोले टर-टर-टर
आसमान बोले घर-घर-घर
और हुमारे दिल धड़के धक-धक=धक
तुम सबको भी यूँ ही लगता है क्या?

बोले सारे गोप-गोपियाँ
हाँ जी! हमें भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है!
ये सब उस नटखट किशन की लीला है
जिससे उन्हें बेहद आनंद मिलता है!

हम उनके लिए तरसे और तडपे
और हमे देखकर वे आनंदित हो जाए
ताली बजाए और बाँसुरी बजाए
और हमे और ज़्यादा उनकी याद दिलाए!

ये ही लीला तो चलती आ रही है बहुत जन्म से
सच कहो तो द्वापर युग से
तब से लेकर अब तक ये भागी दौड़ी
कभी हम उनके पीछे और हभी वे हमारे पीछे!

पहले तो हमारे गिले शिकवे सुनने को मा यशोदा थी
अब सूबद्रा तो है पर दूसरे रूप मे कि लगता है वो हमे भूल ही गयी है!
और अब हम किसके पास जाएँगे किशन की शिकायत लेकर?
चलो हम उन्ही को सुनाते है उन्ही की शिकायत!

हे किशन ! अब बस भी करो तुम्हारी ये मनमानी!
क्योकि अब बहुत हो गई है तुम्हारी ये क्रीड़ा!
तुम तो इस लीला मे रस लेते लेते करुणा करना भी भूल गये हो
और बन गये हो अब निर्दयी! हमे बेहद तड़पानेवाले!

बस! अब आ भी जाओ तुम्हारे वो मन्मोही रूप लिए
सुनो भी ये भेड़-बकरियों की तड़प और चीक
ज़रा गौर करो! ये पंचियाँ तो चहचहना भूल गये है!
ना ही यहाँ मोर नाचता है अब और ना ही कोयल गाती है!

देखो ये वृक्ष-लताये हो गये हैं उदास
सारी ब्रज मे छाया है एक सन्नाट्टा
लगता है एक युग बीत गया
यमुना के तट मे ना बाँसुरी की गूज़ और ना पायल की झन्झन!

अरे देखो! मेरे प्यारे गोप और गोपियाँ
कैसे नाचने लगे ये वृक्ष और लताये!
और कैसे चहकने लगे ये पंछी
नाच रहा मोर और गा रही कोयल

सारी ब्रज मे गूँज उठा बाँसुरी का धुन
सावन के बूंदों मे गूँजे दिव्य प्रेम के सरगम
आ रहे है! आ रहे है! हमारे किशन काली घटाओ मे सवार
सावन का मौसम लाया ब्रज मे ख़ुसी का त्योहार!


भाव या बुद्धि

mind intellect and personalityintellectfeelings

भाव की है कई रूप! भाव की है कई रंग!
मानुष जीवन मे इसकी परिचय तो शुरू होती है अहंभाव से!
और जीवन की सिद्धी होती है
लेकिन ‘अहम’ की भाव से!

अहंभाव मे तो भाव होता लेकिन किस काम का?
“मुझे मालूम है! मे खुश हूँ! मे बीमार हूँ! मे भक्त हूँ! मे अच्छा हूँ! मे सुंदर हूँ!”
ये सब भाव मेरे अंदर उठते, कुछ रह जाते, कुछ बह जाते!
जो बह जाते वे ना करे नुकसान, पर जो रह जाते उनका क्या?

बस! उनसे यह होता है व कि वे पहुँचाते हानि
दूसरों को, सारे वातावरण को, और ज़्यादा से ज़्यादा खुद को!
इनसे फायिदा किसी का हो ना हो कभी
ये करे ज़रूर नुकसान, उसी वक्त, या, कभी, समय आने पर!

पर इस भाव के महासागर मे एक ऐसा भी मोड़ आता है
जब मानव यह समझ जाए कि यह तो स्वार्थ है! बेवफ़ाई है जीवन से और खुद से!
तब, जाने या अंजाने मे वह किसी और की तलाश मे रहता है!
और समय का बहाव उसे उन तक पहुँचाता है!

हाँ! उन तक पहुँचाता है एक ऐसी किरण
जो सूरज के किरणों से कम नही!
और दिन रात रोशनी हम तक पहुँचाए!
फिर दिन क्या और रात क्या और ऐसा मानव को इनसे क्या?

इस मोड़ पर उसकी ज़िंदगी ऐसी संवर जाती है
कि वह जीवन मे रहे, जग मे रहे, पर सिर्फ़ एक साक्षी बनकर!
काम! क्रोध! लोभ! मोह!
दुख और सुख! कामयाबी और हार!

इनसे अब लेना देना क्या उसका?
जो अहंभाव को देख रहा हो,उसमे बुद्धी का काम भी देख रहा हो!
और यह जान लेता कि अहंभाव मे बुद्धी भी दुष्काम मे लगे रहे!
ऐसे दुष्काम जिसमे किसी को फायिदा नही, उल्टा नुकसान हो!

देखते देखते सूरज के किर्ने उस तक पहुँच जाते!
और तब अहंभाव का अर्थार्थ हुआ ‘अहम का भाव’
ऐसा ‘अहम’ का भाव जो ‘सो हम’, ‘ सो हम’ करते करते ‘सो है’ मे बदल जाए!
तब सोहम’ या ‘सो है’ का भाव यानि मतलब एक ही हुए!

ऐसे मे बुद्धी बने तीक्ष्ण!
शरीर उठाए कठिन से कठिन सेवा!
क्योंउकि शरीर मन को नही! मन शरीर को उठाए!
मन अनंत मे जा मिला और हुआ एक चट्टान!

जो कोई आँधी या तूफान आने पर भी हिले तक नही!
ऐसी मिली शक्ति शरीर को जिससे सेवा का उपहार मिला!
और शरीर, मन और बुद्धी की ऐसी त्रिवेणी बहे!
कि जो शिव के सिर्मन्डल से उद्भव हुए!

और बहते रहे दिन भर, साल भर, युग से युग तक!
और बना ‘चिरंजीव’ जिस पर यह कृपा हुई!
क्यों की जनम-जनम से रही जिसकी तलाश
अब पाया है उसने वो मंज़िल!

मंज़िल तो मिला, पर कदम ना रूखे उसकी
चलते रहे, चलते रहे उसके कदम!
और तब तक चलते रहे जब तक यह स्रिश्टी हो!
यह धरती हो, ये पेड़ पौदे हो, ये जानवर हो!

और जब तक मनुष्य जनम लेते रहे इस धरती पर!
क्योंकि उसका काम तो शुरू हुआ है अब!
क्योंकि उसे शिक्षा अब देनी है मानव जात को!
की देर है! अंधेर नही! तुम भी पाओगे मंज़िल!

जो है मंज़िल अंतरात्मा की!
जब यह पहुँचे उस मोड़ पर जहाँ पर खुदा मिले
और मनुष जीने लगे जीवन बुद्धी, भाव, भक्ति और युक्ति की सही मेल से !
रिश्तों को निभाने लगे भाव से कम और बुद्धि से ज़्यादा!

पर भाव को ना जाने दे व्यर्थ!
क्यों की ये मिले है उसे उस खुदा की दया से!
जिनकी ही दया से ये मूड जाए उन्ही की तरफ!
खुदाई क्या? और कुछ भी नही! बस! बुद्धि का भाव से मिल जाना!

और क्या रह गया बाकि ऐसे मानव को
जिसके ये अनुभव हुए कि सब कुछ है तो कुछ भी नही और कुछ भी नही तो सब कुछ है!
सब मे शून्य, शून्य मे पूर्ण, और पूर्ण मे सब!
सब मे एक, एक मे सब, एक है अनेक, अनेक मे एक!

मेरे गुरू मे है सब!
उनमे ही श्रिश्टी! उनमे ही प्रलय!
उनमे ही आकाश! उनमे ही धरती!
उनमे ही जीवन! उनमे ही मृत्यू!

उनमे ही कृष्ण! उनमे ही राधा!
उनमे ही शक्ति! उनमे ही शिव!
उनमे ही राम! उनमे ही रावण!
उनमे ही भाव! उनमे ही भावना!

भवानी से भावना! भावना से फिर भवानी!
श्याम से राधे! और फिर राधे से श्याम!
फिर और कोई गण! और कोई कण!
और कोई रण! और कोई धर्मयुद्ध!

हाँ! और कोई भी बात उनके बाहर नही!
तो फिर वो ही बात मेरे भी बाहर नही!
क्योंकि सब है उनमे और वे है मुझमे!
तो फिर शोरू ऐसी प्रेम कहानी!

हाँ! ऐसी प्रेम कहानी जिसका आदी नही अंत नही!
ये ‘शुरू’ ‘ख़तम’ तो मानव के चेतना से जुड़ी है!
जो इस काए मे प्रेम कहानी का अनुभव करता हो!
जो प्रेम कहानी है हर गुरु और शिष्य की!

जो कहानी है चेतना और मनुष्य की!
जो कहानी है सागर और लहर की!
जो कहानी है बुद्धी और आत्मज्ञान की!
और जो कहानी है राधा और किशन की!




यह चुनौती है मेरी तुमसे हे प्रभो!
कि न रहे हम, न रहो तुम इस काया वस्त्र मे
और चाहे दूसरा वस्त्र अपना ले या फिर जन्म ही न ले
मे पाऊ तुमको सदा खुद मे और तुम पाओ खुद को सदा मुझ मे!

कभी पीछा न छोड़ू मे तुम्हारा
चाहे तुम लाख कोशिश करो
पीछा छोड़ू तो भी यह कैसे संभव है?
क्योंकि कभी तुम हो मेरे पीछे, कभी हो आगे और कभी हो साथ साथ!

मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे चारों और
मेरे ऊपर यह वायुमंडल मे
इस मिट्टी मे, इस रेत मे
मेरे बाहर, मेरे भीतर, सब जगह तुम्ही तुम हो!

मुझे इस जीवन से क्या? इस जन्म से क्या?
कुछ नही है लेना देना मेरा इनसे अब
अब तो बात सिर्फ़ जाने की है
मेरी ज़िंदगी तो अब बन गयी है अमर!

क्योंकि साँज़ लेने का नाम ज़िंदगी रही तो
अब मृत्यु भी ज़िंदगी है, उसपार भी ज़िंदगी है!
सागर को क्या ज़रूरत है किनारा तलाश करने की?
सागर है तो किनारा भी तो है!

तो मेरे नटखट किशन !मेरे प्यारे गुरुवर!
तुम जितना चाहे लो परीक्षा मेरी
जितना चाहे तुम डाल दो मुझे आनंद और तड़प की भवर् मे
मे रहूंगी खड़ी तुम्हारा नाम लिए!

क्योंकि आनंद और दर्द तो मुझे नही छू सकते!
इस भवसागर मे तो इनका परिचय और है
पर इस प्रेंसागर मे ये जुड़े है तुमसे!
तुमसे ही आनंद तुमसे ही दर्द अब मे जाऊ तो भी जाऊ कहाँ?

ये भी तो अनुभूतियाँ है जिससे मे गुज़रती हूँ!
पर ये ना करे कभी मेरा नुकसान
क्योंकी ये है भेंट मेरे लिए, तुम्हारे दिए हुए!
जो लहर बनकर आए, ऊपर उठे और आख़िर ये तुम मे ही समा जाए!

तो फिर बाकी क्या रहा कहने को
ये ही! बस! कि तुमसे चुनौती रही मेरी
और मुझ से रही तुम्हारी
दोनों आख़िर एक ही बात मे आ पहुँचे!

की तुम रहो तो हम
हम रहे तो तुम
और रहे चुनौती ‘एक दूसरे’ से!
पर ये हम तुम रहे जब तक ये महासागर मे ना समा जाए!

तो हो गये दूर सारे भ्रम
और गूंजने लगे ब्रह्मानंद के सप्तस्वर मेरे अंदर!
फिर भी जब तक यह काया है
जिससे हम हम है, और तुम तुम हो!

यह चुनौती की क्रीड़ा चलती रहे!
क्योंकी इसमे है रस अपरंपार जो मे तुमसे कह ना सकूँ
इस ‘रस’ मे जब तुमने मुझे भिगो ही दिया है
तो रस और क्रीड़ा की विग्रह संधि संभव हुई!

मेरे प्राण हो तुम, मेरी हर साँस मे हो तुम!
मेरी हर हँसी मे हो तुम, और मेरी आसू मे भी तो तुम ही तुम हो!
हर गुण मे हो तुम! और तुम ही तो हो मेरी हर अवगुण मे भी!
मेरी हर तारीफ मे हो तुम और हर शिकायत मे भी!

इस भव के हर रिश्ते मे हो तुम ही तुम!
तो हर रिश्ता बना एक प्रेम कहानी!
जो मेरे प्रति वैर करे उनमे भी हो तुम
तो फिर हर शिकायत भी ना रहा शिकायत!

तो मेरी ज़िंदगी बन गयी एक चमन!
जिसमे हर तरह के लोग हुए फूल!
और किसी फूल मे काँटे है तो किसी मे नही!
तो मालिक का क्या दोष की मे ध्यान रिक्त रहूं?

की मे ध्यान रिक्त रहूँ और काँटे निकालते वक्त फूल को नुकसान पहुँचाउं!
और खुद को भी क्योंरकि काँटे चुबे तो मुझे भी!
पर तुम्हारी चाल से चलूं तो
फूल से काँटों को प्यार से निकालूं!

काँटे ना चुबे मुझे और फूल भी रहे सुंदर!
कोमल, निर्मल! हर फूल से बना मेरा चमन!
जिन से बढ़े चमन की शोभा!
फूल! माली! चमन! सब इस भरपूर जीवन का अर्थार्थ सिखाए!




चक्रव्यूह- यह शब्द सुनते ही हुमारा हिंदू पुराण के प्रति ख्याल उठता है
वो भी अभिमन्यु का, जो अर्जुन का सुपुत्र था
क्योंकि वे अभिमन्यु ही थे जो चक्रव्यूह मे ऐसे फँसे कि निकल ना पाए!
और फिर चक्रव्यूह के अंतर ही प्राण त्याग दिए!

कुछ ऐसा ही चक्रव्यूह इनसान की ज़िंदगी मे भी रचता है
जब जब वो भवसागर की रणभूमी से गुज़रता है!
तो निकलने के कई तरीकों की तलाश करता है!
जब तक उसके ऊपर गुरू की मेहर ना हो!

और जैसे ही मेहर की ओडनी उस पर आ गिरती है
सारे किवाड़ अपने आप खुल जाते है और सारे रास्ते अपने आप दिखने लगते है!
इस जीवन की रणभूमी मे ऐसा कोई चक्रव्यूह है ही नही!
जो खोला नही जेया सकता हो – कब और कहाँ बस यह तो वे ही जाने!

बस! हम इतना समझले कि ये सब मन की कपट विद्या है!
जो हमें इन रिश्तों और बंधन के मायाजाल मे फ़साता है!
और फिर हम इस संसार की बातों मे ऐसे फँस जाते है
जो हमे ईर्षा, क्रोध, मोह और लोभ की झकद मे डाल देता है!

फिर हम अपने स्वसभाव भूल जाते है
जिसके कारण दुर्विचार और दुष्काम को पैदा करने लगते है!
और आख़िर अपने ही बिछाए जाल मे ही हम फँस जाते है!
और दुखी होकर ज़िंदगी से ही मुँह मोड़ लेते है!

और ऐसे जीवन बिताते है जिसमे ना ही कोई खुशी और ना ही कोई उमीद
ना ही कोई सपने, और ना ही कोई मंज़िल!
बस! यूँ समझले कि हम इतने कमज़ोर ना होते हुए भी
आधे ज्ञान के पात्र हो जाते है जैसे कि अभिमन्यु!

अभ्मन्यु को रणभूमि मे गुज़ना मालूम तो था!
जिस कारण वो आँखरी दम तक अपने दुश्मनों से लड़ता रहा!
पर सारे दुश्मनों ने मिलके उनके ऊपर आक्रमण किया जो रणनीति के खिलाफ था!
और छल से मारा अभिमन्यु को जो वीर था और लड़ते-लड़ते चक्रव्यूह के अंदर ही दम तोड़ दिया!

वोही तो हमारे जीवन-मृत्यु के चरित्र बने
जो आधे ज्ञान मे इस भव-सागर के बंधन के चक्रव्यूह मे घुस जाते है!
पर निकल नही पाते और अपनी अन्दरात्मा को सुन नही पाते
और मृत्यु का अनुभव जीते जी कर लेते है!

गुरू की मेहर होते ही शिष्य की जीवन मे कभी-कभी ऐसे ही मोड़ आते है!
वो इसलिए कि गुरू उनकी परीक्षा लेते नज़र आते है!
असल मे वे अपने लायक शिष्य को
हर अनुभव के पार होते हुए परम की ओर ले जाना चाहते है!

कोई भी ज्ञान अनुभव किए बिना अदूरा है, आधा सच है!
ऐसा शिष्य जो इन चक्रव्यूहॉ से निकल जाता है
वह यह जान लेता है कि जीवन की पूंजी आत्मज्ञांन और सत्य की तलाश है!
जिसके रास्ते मे जो भी या कुछ भी आए, उन्हे ख़त्म करे!

चाहे वो सगे संबंधी हो
चाहे वो दुनिया के मत भेद या रीति रिवाज
जब भी किसी व्यक्ति से या किसी महोल से घुटन महसूस होती है
और ना वो व्यक्ति बदले, और ना ही हम अपने आप को बदल पाए!

और दोनो मिलकर ऐसा महोल बनाते है
जिससे एक प्रदूषित हो जाता है
और दूसरों को भी प्रदूषित कर देता है!
ऐसे व्यक्ति के संपर्क से दूर रहे!

और वो भी अपने अहंकार से नही
वो तब, जब यह अनुभव करे कि
वह हमारे आत्मा की पुकार को नही सुनता
हमारी हर इच्छा को हर संकल्प को विकल्प मे बदल देता है!

हमारे हर विश्वास को बदनाम कर देता
हमारे खुद की सोच, जीवन के डॅंग, दोस्तों की महफ़िल
पसंद ना पसंद, भोजन, खुदा, धर्म, भक्ति, मंदिर इन सब के ख्याल
इन सब पर ज़ंजीर डाल देता!

उल्टा ये अपेक्षा करता हमसे कि अपनी आत्मा की पुकार ना सुने
और उनके जैसे, इस दुनिया मे कोई लोग जैसे
धर्म, भगवान, भक्ति, रीति-रिवाज को नियम की तरह अपनाए!
और अपने आप को, दूसरों को ,धोका देते रहे!

हाँ! अपने आप को और दूसरों को धोका देते रहे!
कि भगवान रूप मे ही है जैसे कृष्णा, राम, बालाजी
और भगवान की भक्ति के लिए मंदिर जाए, सुबह शाम मूर्ति के सामने पूजा करे!
दिया जलाए, रंगोली डाले, नाम जपे!

पर ये सब बाहर ही बाहर जो अहंकार के लक्षण बने
पूजा, भक्ति, त्योहार पर घमंट करे, दूसरों को नास्तिक कहे
नाम जपे, मंदिर जाए, त्योहार मनाए
पर पहली शिक्षा ‘इनसानी धर्म’ को भूल जाए!

यह भूल जाए कि पहली सीडी खुदा की तरफ
तुम तब पार करोगे जब तुम इतने अंतर्मुखी बन जाओगे
कि खुद मे ही अच्छा बुरा देखलो और दूसरे नज़र ना आए
तो फिर उनका विश्वास भी सच और तुम्हारा भी!

उनका धर्म और तुम्हारा धर्म एक है!
तो जिओ और जीने दो औरों को भी मस्ती मे!
उनके रूप, उनके नाम, उनकी भाषा सब अलग है
पर उनकी पहचान तो एक है!

खुदा की तलाश तो खुद की तलाश है
जो दुनिया या समाज के बताए हुए रास्तों का ही ज़रूरी ना हो!
अलग-अलग जीवात्मा, उनकी अलग-अलग तलाश!
पर एक सत्य जो निस्चल और अटल है!

और वो सत्य यह है कि
समाज के नाम से, धर्म के नाम से
भगवान के नाम से, भक्ति के नाम से
तुम अपने अहंकार की पूजा ना करो!

उल्टा यह देखो कि मेरा भगवान, मेरा धर्म
सिर्फ़ ऊपर की चमक है
जिसके गिस जाने मे देर नही लगती!
और ना ही तुम भगवान को या खुद को धोका दे सकते हो!

समाज के नियम, मत, तीर्थ स्थान
ये सब तो सीडी है, मंज़िल नही!
इस सीडी को सीडी ही रहने दो!
और इन्हे किसी तरह प्रयोग ना करो!

यह ध्यान रहे समाज के बनाए नियम
तुम्हारे लिए कही बाधा ना बन जाए!
जो तुम्हे सत्य को खोजने से रोके
और ज़िंदगी यूँ ही सीडीयों मे ही गुज़र जाए!

ये समाज के नियम इसलिए बनाए गये है
कि तुम इनके दायरे मे रहो
खुद को एक आनुशासनन मे डाल दो
और इसलिए नही कि ये तुम्हे खुली सांज़ लेने से रोक ले!

क्योंकि हर इंसान के अपने डॅंग है
अपने स्वाभाव से भगवान यानि खुद को पाने का हक है!
और ये हक कोई हमसे छीनले?
ऐसे कमजोर ना बनो कि बाजी हार जाओ!

हम सब दुनिया मे ऐसे ही तो जी रहे है!
धर्म और भगवान के नाम पर हमने क्या पाया?
कुछ पुरस्कार! कुछ तिरस्कार!
कुछ दुश्मन! कुछ दोस्त!

और इनके ज़रिए अपने अहंकार को हमेशा बनाए रखे
इसलिए तो दुनिया मे सब कुछ है
मंदिर! मस्जिद, संत भक्त
लेकिन सत्य जिसे भगवान, जीवन का लक्ष्य कहते है!

हाँ! वोही तो जीवन की असली पूंजी है!
वो ही तो हमारी समझ या अनुभव से बाहर है!
इसलिए जागो! बदलो खुद को!
और बदलो इस समाज के बहाव को!

रूप, नाम, धर्म, यह सब वस्त्र है तो भगवान शरीर है!
ये सब है बोली, भगवान है जीबा
ये सब है वे जिनकी आदी है, अंत है!
और भगवान है , अनादि अनंत!

यह मनुष्य जीवन सबसे बड़ा तोफा है!
जिसे पाकर हमको परम से मिलने या सत्य को पाने का अवसर मिला है !
तो! आगे बढ़ो! और दूसरों को भी चलने दो उनके रास्ते पर!
ताकि इस दुनिया मे देश और इनसान के बीच नफ़रत, वैर ने हो!

धो डालो इस अहंकार की मैल को, मान की स्वचता और समर्पण से!
हटाओ इस अहंकार को शुधता की एक किरण से!
फिर पाओगे तुम मंज़िल इस ज़िंदगी की
और करोगे मार्गदर्शन सारी दुनिया का!